भरण - पोषण का अधिकार - पत्नी की गरिमा और सुरक्षा का कानूनी कवच (हिंदू दत्तक एवं भरण-पोषण अधिनियम, 1956)
भरण-पोषण का अर्थ है किसी व्यक्ति की जीवन-निर्वाह की आवश्यकताओं को पूरा करना। इसमें भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा, चिकित्सा और अन्य जरूरी सुविधाएं शामिल होती हैं। कानून के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति स्वयं अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ है, तो उसके निकट संबंधी (जैसे पति, माता-पिता या संतान) पर उसका दायित्व आता है। विशेष रूप से, पत्नी का भरण-पोषण करना पति का कानूनी और नैतिक कर्तव्य माना गया है, ताकि वह सम्मानपूर्वक जीवन जी सके। 🔹 हिंदू दत्तक एवं भरण-पोषण अधिनियम, 1956 का परिचय यह अधिनियम हिंदू कानून के अंतर्गत दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण से जुड़े अधिकारों और दायित्वों को स्पष्ट करता है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि परिवार के कमजोर सदस्यों, विशेषकर पत्नी, बच्चों और वृद्ध माता-पिता को आर्थिक सुरक्षा मिल सके। 🔹 पत्नी के भरण-पोषण से संबंधित प्रावधान 1️⃣ पत्नी का भरण-पोषण पाने का अधिकार इस अधिनियम की धारा 18 के अनुसार, पत्नी को अपने पति से भरण-पोषण पाने का अधिकार है, जब तक वह वैवाहिक संबंध में है। 2️⃣ अलग रहकर भी भरण-पोषण का अधिकार पत्नी कुछ परिस्थितियों में पति से अलग रहकर भी...